भिलाई। दुर्ग जिले की 31 वर्षीय डॉक्टर अंकिता खंडेलवाल ने अपने करियर में करीब एक हजार पोस्टमार्टम किए हैं। शवों के साथ लगातार काम करने वाले इस पेशे को लेकर उनका नजरिया भी समय के साथ बदलता गया। उनका कहना है कि अब उन्हें मुर्दों से डर नहीं लगता, बल्कि जिंदा इंसानों से डर लगता है। उनके मुताबिक, मृत व्यक्ति किसी को नुकसान नहीं पहुंचा सकता, लेकिन कोई गलत इरादे वाला जिंदा इंसान जिंदगी में परेशानी खड़ी कर सकता है।
डॉ. अंकिता के लिए शुरुआत में पोस्टमार्टम करना आसान नहीं था। शवों को देखकर और मौत के अलग-अलग मामलों की परिस्थितियों से गुजरते हुए भावनात्मक दबाव महसूस होता था। हालांकि, लगातार अनुभव और पेशेवर जिम्मेदारी ने धीरे-धीरे उनके भीतर इस काम को लेकर सहजता पैदा कर दी। आज पोस्टमार्टम उनके चिकित्सकीय कार्य का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसे वह पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ करती हैं।
मौत के कारणों की पड़ताल में अहम भूमिका
पोस्टमार्टम केवल शव की जांच तक सीमित प्रक्रिया नहीं है। इसके माध्यम से मृत्यु के कारणों और परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण चिकित्सकीय जानकारी मिलती है। कई मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट जांच और कानूनी प्रक्रिया के लिए भी अहम आधार बनती है। डॉ. अंकिता ने इस जिम्मेदारी को लंबे समय से निभाते हुए करीब एक हजार मामलों का अनुभव हासिल किया है।
इस पेशे ने उन्हें जिंदगी और मौत को देखने का अलग नजरिया भी दिया है। उनका अनुभव बताता है कि रोजाना मौत को करीब से देखने के बावजूद इंसान के भीतर जीवन के प्रति समझ और संवेदनशीलता बनी रह सकती है। समय के साथ जिस काम से शुरुआती दौर में डर और बेचैनी होती थी, वही काम अब उनके लिए पेशेवर जिम्मेदारी बन चुका है।
‘मुर्दा आपका कुछ नहीं कर सकता’
डॉ. अंकिता का यह अनुभव उनके पेशे के प्रति बदले नजरिए को सामने रखता है। उनका मानना है कि मृत शरीर से डरने की बजाय इंसान को जीवित लोगों के व्यवहार और इरादों को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। करीब एक हजार पोस्टमार्टम का अनुभव रखने वाली इस डॉक्टर की कहानी चिकित्सा के उस पक्ष को सामने लाती है, जिसके बारे में आम तौर पर कम चर्चा होती है।